रविवार, 2 जुलाई 2017

प्यार

यार सोचता हूं,
कलम प्यार लिखती है.
कहीं मैं मोहब्बत में तो नहीं !
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गुरुवार, 26 जनवरी 2017

(लघुकथा) घर



वह गांव से शहर आया था, कुछ छोटा-मोटा काम खोजता हुआ. शुरू-शुरू में ख़र्चा बांट कर किसी के साथ रहने लगा. उधर, किसी पक्की नौकरी की कोशिश भी करता रहा. एक दिन, एक बड़े कारखाने में बात बन ही गर्इ, नौकरी पक्की तो नहीं थी पर यह पता चला कि अगर पांच साल तक मेहनत से काम करे तो वह पक्का भी हो सकता है. गंवर्इ था, मेहनत और र्इमानदारी के अलावा उनके पास कुछ  होता भी क्या है, उसे पता था कि वह पक्का हो जाएगा. और हुआ भी.

इस बीच घर वालों ने एक लड़की देख कर उसकी शादी कर दी थी. उसने एक कमरा किराए पर ले लिया. हर दो-एक साल में मकान बदलते भी रहे. इस बीच, दो बच्चे भी हो गए. पढ़ार्इ भी करता रहा. जीवन में बहुत कुछ तेजी से बदल रहा था. जो नहीं बदल रहा था वह था, एक कमरे का मकान. रसोर्इ, बेडरूम, ड्राइंगरूम सब एक ही जगह. उसका बस एक ही सपना था, तीन बेडरूम का मकान. एक कमरा अपने लिए, एक बेटी के लिए, एक बेटे के लिए.

समय फिर बदला, कुछ छोटी-मोटी तरक्कियों के बाद सारी जमापूंजी और लोन मिलाकर उसने इएमआर्इ वाला तीन कमरे का एक मकान ले ही लिया. उसका सपना पूरा हो गया. बच्चों से ज्यादा अब वह ख़ुश था. कुछ साल बाद बच्चों ने स्कूल की पढ़ार्इ पूरी की. बेटा कॉलेज चला गया. बेटी दूसरे शहर के हॉस्‍टल में रहकर पढ़ने लगी. पढ़ार्इ के बाद, बेटे की नौकरी दूसरे शहर में लग गर्इ. बाद में, बेटी भी किसी और शहर में नौकरी करने लगी.

एक दिन, पति-पत्नी दोनों चुपचाप बैठे टीवी देख रहे थे. उसने अनायास पूछा -'क्या तुम्हें यह नहीं लगता कि हमारे लिए एक कमरे का मकान ही ठीक था ?' तभी उसने देखा कि पत्नी उठ कर, आंख से टपक आए आंसू को उंगली से रोकती हुर्इ बेटी के कमरे की ओर जा रही थी.
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शनिवार, 10 दिसंबर 2016

(लघुकथा) संतान



उसकी शादी हुए कुछ समय हो गया था. पर गोद अभी नहीं भरी थी. यूं तो इस बात पर किसी का कोर्इ ख़ास ध्यान नहीं था पर उसकी सास को इस बात का मलाल था और, गाहे-बगाहे इस बारे में कुछ टेढ़ा सा सुना ही देती थी. उनके घरों में, इन मामलों में डॉक्‍टरों की सलाह लेना ज़रा सही नहीं माना जाता था. यह तो तय ही था कि कमी होगी तो बहू में ही होगी जो वह मां नहीं बन पा रही थी. पति दुकान के काम-धंधे में बहुत व्यस्त रहता था, और सास बहू के मामलों से वैसे भी ख़ुद को दूर ही रखता था. उसका हमेशा यही कहना होता था कि भर्इ आपस में ही सुलटा लिया करो, मुझे बीच में न घसीटा करो. 

सास ने बहू को समझाया कि फलां शहर के एक बाबाजी  पूजा करके बेटा होने की शर्तिया दवा देते हैं. चलो उनसे मिल लेते हैं. सास बहू बाबा के यहां गर्इं.  बाबा ने सास की बात ध्यान से सुनी और बताया कि विशेष पूजा आयोजित करनी पड़ेगी जिसमें केवल बहू को भाग लेना है. बाबा पूजा आयोजित करने में व्यस्त हो गए, सास दूसरे भवन में कीर्तन सुनने चली गर्इ. आध-पौन घंटे बाद वह लौटी तो बहू बेहोश सी थी. बाबा ने कुछ पुड़िया दीं और कहा कि रोज़ाना रात एक देते रहना. 

रास्ते में बहू ने कहा कि उसके साथ ठीक नहीं हुआ. सास ने बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. दो महीने होते-होते बहू को उल्टियों की शिकायत हो चली. सास, दादी बनने की ख़बर से फूली न समार्इ. बहू के बेटा तो नहीं हुआ पर एक बेटी का जन्म हुआ. दादी खुश तो हुर्इ पर उतनी भी नहीं कि कोर्इ उत्सव मनाया जाता. 
 
उसने बाबा के यहां फलों की एक टोकरी भिजवा दी.
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